कामयाबी और नाकामयाबी

कामयाबी और नाकामयाबी दोनों ज़िन्दगी के हिस्से हैं।
दोनों ही स्थायी नहीं हैं ।


भगवान, हमारे निर्माता ने हमारे मष्तिष्क और व्यक्तित्व में असीमित शक्तियां और क्षमताएं दी हैं।
ईश्वर की प्रार्थना हमें इन शक्तियों को विकसित करने में मदद करती है।


क्रोध से भ्रम पैदा होता है।
भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है।
जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है।
जब तर्क नष्ट होता है तब व्यक्ति का पतन हो जाता है।
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सभी प्रचार लोकप्रिय होने चाहिए
और इन्हें जिन तक पहुचाना है
उनमे से सबसे कम बुद्धिमान व्यक्ति के भी समझ में आने चाहियें .