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न जाने उनकी क्या मजबूरी थी

वो छोड़ के गए हमें;
न जाने उनकी क्या मजबूरी थी;
खुदा ने कहा इसमें उनका कोई कसूर नहीं;
ये कहानी तो मैंने लिखी ही अधूरी थी।
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मिज़ाज़ अलग है बस ग़ुरूर नहीं है।
फ़िर वो दरिया ही क्या जिसमें सुरूर नहीं है।
फ़क़त इल्ज़ाम लगे तोहमतों से दो चार हुए।
बस यहाँ एक हम ही तो हैं जो मज़बूर नहीं हैं।

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